रायपुर।अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट के बाद देश के आर्थिक नीति-निर्माताओं और सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल $110 से गिरकर $73 प्रति बैरल पर आ चुका है, तब भी देश के आम नागरिकों को महंगे ईंधन से कोई राहत नहीं मिलना सीधे तौर पर नीतिगत नाकामी को दर्शाता है।महंगाई की चौतरफा मार झेल रही जनता के बीच अब यह बहस तेज हो गई है कि आखिर सरकार आर्थिक संतुलन बनाने और आम आदमी को राहत देने में कहां चूक रही है।समझिए गणित: बिना टैक्स के सिर्फ ₹51 का पेट्रोल, हमसे वसूला जा रहा ₹108!जनता को यह जानकर हैरानी होगी कि जो पेट्रोल रायपुर में आज करीब ₹108.30 प्रति लीटर बिक रहा है, उसकी फैक्टरी (रिफाइनरी) से निकलने वाली वास्तविक कीमत बेहद कम है। तेल के खेल का पूरा कच्चा चिट्ठा इस प्रकार है: वास्तविक बेस प्राइस (Base Price): कच्चे तेल की खरीद, भारत तक लाने का किराया (FOB) और रिफाइनरी का प्रोसेसिंग खर्च मिलाकर पेट्रोल की बिना टैक्स के वास्तविक कीमत लगभग ₹51.50 प्रति लीटर बैठती है। डीलर का कमीशन: इसमें पेट्रोल पंप संचालक का कमीशन लगभग ₹3.80 प्रति लीटर जुड़ता है। यानी बिना टैक्स के कुल कीमत: करीब ₹55.30 प्रति लीटर।
अब सवाल यह उठता है कि ₹55 का पेट्रोल जनता तक पहुंचते-पहुंचते ₹108 का कैसे हो जाता है? जवाब है—सरकार का भारी-भरकम टैक्स। इस ₹55 की कीमत पर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) और राज्य सरकार का वैट (VAT) मिलकर करीब ₹53 प्रति लीटर का टैक्स ठोक दिया जाता है। यानी जितना तेल का दाम नहीं, उतना सरकार टैक्स वसूल रही है।
सरकार की नीतियां जहां हो रही हैं पूरी तरह नाकाम:
1. डायनामिक प्राइसिंग (Dynamic Pricing) का फेल होनासाल 2017 में सरकार ने नियम बनाया था कि देश में रोज सुबह अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से पेट्रोल-डीजल के दाम तय होंगे। दावा था कि इससे पारदर्शिता आएगी और वैश्विक गिरावट का सीधा फायदा जनता को मिलेगा। लेकिन असलियत यह है कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो दाम तुरंत बढ़ा दिए जाते हैं, पर जब रिकॉर्ड गिरावट आती है, तो दाम हफ्तों तक ‘फ्रीज’ (स्थिर) कर दिए जाते हैं। इस नियम को अपनी सुविधा के अनुसार चलाना नीतिगत विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
2. टैक्स कम न करने की जिदजब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल $73 पर आ चुका है, तब सरकारें आसानी से टैक्स में कटौती करके जनता को सीधे तौर पर राहत दे सकती थीं। ईंधन सस्ता होने से मालभाड़ा घटता और बाजार में जरूरी चीजों के दाम कम होते। लेकिन राजस्व (Revenue) जुटाने की अंधी दौड़ में टैक्स कम न करना सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।
3. तेल कंपनियों पर ढीला नियंत्रण :
सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां (IOCL, BPCL, HPCL) इस समय कच्चे तेल की कम कीमतों के कारण रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं। जून की हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि कंपनियों का पिछला घाटा लगभग खत्म हो चुका है और वे प्रति लीटर ₹10 से ₹12 तक का मुनाफा (मार्जिन) निकाल रही हैं। इसके बावजूद, नियामक (Regulator) के तौर पर सरकार तेल कंपनियों को रिटेल कीमतें घटाने के लिए बाध्य करने में पूरी तरह नाकाम रही है।
4. GST के दायरे से बाहर रखने की राजनीतिक मजबूरी
पिछले कई सालों से पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने की मांग हो रही है ताकि पूरे देश में टैक्स का एक पारदर्शी ढांचा (अधिकतम 28%) लागू हो सके। अगर ऐसा होता है, तो टैक्स सीधा आधा हो जाएगा और पेट्रोल ₹70-₹75 के स्तर पर आ जाएगा। लेकिन केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय खींचतान और आम सहमति बनाने में नाकामी के कारण आज भी ईंधन को इससे बाहर रखा गया है, जिसका खामियाजा आम उपभोक्ता भुगत रहा है।
जनता की उम्मीदों पर पानी :
एक तरफ सरकार तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी जरूरत यानी ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने का कोई ठोस रोडमैप दिखाई नहीं देता।
कच्चे तेल में आई मंदी के दौर में भी अगर रायपुर में पेट्रोल ₹108 प्रति लीटर पर टिका हुआ है, तो यह साफ है कि आर्थिक नीतियों का झुकाव आम जनता को राहत देने के बजाय केवल सरकारी खजाने और कॉर्पोरेट मुनाफे को सुरक्षित रखने की तरफ ज्यादा है।

