रायपुर। राजधानी से सटे नया रायपुर के नकटी गांव में आज विकास की अंधी रफ्तार का सबसे दर्दनाक और खौफनाक चेहरा देखने को मिला।
भारी पुलिस बंदोबस्त और प्रशासनिक लश्कर के साथ पहुंचे ‘पीले पंजे’ (बुलडोज़र) ने देखते ही देखते 80 परिवारों के सपनों के आशियानों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया। बरसों की गाढ़ी कमाई से खड़ी की गई दीवारें जब भरभराकर गिर रही थीं, तो पूरा नकटी गांव चीख-पुकार और आंसुओं से दहल उठा।
“भूख से बिलखते बच्चे, बेबस मां” – ज़मीन पर बिखरी ज़िंदगीकार्रवाई के दौरान दिल को झकझोर देने वाले दृश्य सामने आए। मलबे के ढेर पर बैठी एक मासूम बच्ची की सिसकियों ने हर किसी की आंखें नम कर दीं। उस मासूम ने रोते हुए कहा— “सुबह से घर में चूल्हा नहीं जला, मैंने कुछ नहीं खाया।
“अपना सबकुछ लुटता देख महिलाओं का सब्र का बांध टूट गया। वे जेसीबी के सामने खड़ी हो गईं, रोईं-गिड़गिड़ाईं, लेकिन प्रशासनिक अमले का दिल नहीं पसीजा। गृहस्थी का सामान, बच्चों की किताबें और राशन का अनाज मलबे के नीचे दफन हो गया और कई परिवार खुले आसमान के नीचे दाने-दाने को मोहताज हो गए।
रणक्षेत्र बना नकटी:
पुलिस से खूनी झड़प जैसी नौबत, महिलाओं ने संभाला मोर्चाप्रशासन की इस एकतरफा और बर्बर कार्रवाई के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूटा। खासकर महिलाओं ने दुर्गा का रूप धारण कर पुलिसिया घेरे को तोड़ डाला। खाकी वर्दीधारी पुलिसकर्मियों और आक्रोशित महिलाओं के बीच जमकर धक्का-मुक्की और तीखी झड़प हुई।ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें संभलने और अपना कीमती सामान निकालने तक का मौका नहीं दिया गया। तनाव इतना बढ़ गया था कि पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो गया और घंटों तक नकटी गांव एक अघोषित रणक्षेत्र बना रहा।
सरकारी मरहम: ‘उजड़े आशियानों के बदले नया रायपुर में मिलेगा पक्का मकान’इस चौतरफा बवाल, हंगामे और जनता के भारी आक्रोश को देखते हुए बैकफुट पर आए प्रशासन ने ग्रामीणों के गुस्से को शांत करने के लिए बड़ा दांव खेला है। प्रशासनिक अधिकारियों का दावा है कि किसी को भी लावारिस नहीं छोड़ा जाएगा। विस्थापित किए गए इन सभी 80 परिवारों को नया रायपुर के प्राइम लोकेशन में पक्के मकान आवंटित किए जाएंगे।अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई अवैध कब्जे के खिलाफ थी, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए प्रभावितों के पुनर्वास की पूरी व्यवस्था कर ली गई है।
युग न्यूज का तीखा सवाल: सवाल यह उठता है कि अगर पक्के मकान देने ही थे, तो इन गरीब परिवारों को इस तपती धूप में बेघर करने और मासूमों को भूखा रुलाने की क्या जरूरत थी? क्या बिना इस तांडव के शांतिपूर्ण तरीके से शिफ्टिंग नहीं की जा सकती थी?
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