तमिलनाडु की राजनीति और बिजली विभाग से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य सरकार के बिजली विभाग (Tangedco) ने स्मार्ट मीटर लगाने के लिए जारी किए गए करीब ₹20,000 करोड़ के महा-टेंडर को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया है। इस टेंडर के एक बड़े हिस्से के लिए अडाणी समूह की कंपनी ‘अडाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड’ (AESL) ने सबसे कम बोली लगाई थी, लेकिन दरों पर सहमति न बनने के कारण सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया पर ब्रेक लगा दिया है।

इस प्रशासनिक फैसले के आते ही देश भर के सियासी गलियारों और सोशल मीडिया पर एक नया भूचाल आ गया है।
सोशल मीडिया पर पोस्टर वॉर: ‘थलापति’ की एंट्री!
इस फैसले के बाद से इंटरनेट मीडिया पर एक पोस्टर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें तमिल सुपरस्टार और राजनेता ‘थलापति’ विजय को अडाणी के स्मार्ट मीटर को कचरे के डिब्बे में फेंकते हुए दिखाया गया है। सोशल मीडिया यूज़र्स और राजनीतिक समर्थकों का दावा है कि तमिलनाडु की जनता और राजनीतिक दबाव के आगे झुकते हुए इस बड़ी योजना को ‘कचरे के ढेर’ में डाल दिया गया है।
जनता के बीच इस बात को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है कि क्या यह फैसला जनहित में लिया गया है या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक बिसात है।
क्यों रद्द हुआ इतना बड़ा टेंडर?
सरकारी और प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, इस टेंडर को रद्द करने के पीछे विशुद्ध रूप से तकनीकी और कमर्शियल कारण हैं:
1 अत्यधिक दरें (High Rates): अडाणी समूह द्वारा जो दरें (Bids) कोट की गई थीं, वे सरकार के अनुमानित बजट से काफी ज्यादा थीं। आपसी बातचीत के बाद भी जब दरों को कम नहीं किया जा सका, तो बिजली विभाग ने टेंडर निरस्त करना ही बेहतर समझा।
2 नई नीति की तैयारी: विभाग अब इस पूरी योजना के नियमों और पैकेजिंग पर दोबारा विचार कर रहा है, ताकि भविष्य में नए सिरे से और कम लागत में स्मार्ट मीटर लगाए जा सकें।
विपक्ष का पलटवार: क्या होगा ₹5,000 करोड़ के नुकसान का?
इस फैसले पर जहां एक धड़ा जश्न मना रहा है, वहीं विपक्षी दल भाजपा ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह स्मार्ट मीटर प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की ‘रिहैम्पड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम’ (RDSS) का हिस्सा था। अब इस टेंडर के रद्द होने से तमिलनाडु को केंद्र से मिलने वाले लगभग ₹5,000 करोड़ के वित्तीय अनुदान (Subsidy) पर संकट मंडराने लगा है।
युग न्यूज़ नज़रिया
यह मामला सिर्फ एक कॉरपोरेट टेंडर के रद्द होने का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जनता के पैसे, बिजली सुधारों और आने वाले समय में तमिलनाडु की राजनीति की दिशा तय करने वाला मोड़ है। सोशल मीडिया पर भले ही इसे ‘कचरे में फेंकी योजना’ कहकर प्रचारित किया जा रहा हो, लेकिन असल लड़ाई सरकारी खजाने और बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाले असर की है।
क्या सरकार नए टेंडर लाकर जनता को राहत देगी या यह सियासी खींचतान राज्य के विकास को पीछे धकेलेगी? इस पर हमारी नज़र बनी रहेगी।